Monday, 10 August 2015

मासूम

आखिर आप क्या करते ?

उस दिन फ़िर एक सुबह रोज़ की तरह साधारण-सी ही रही। रोज़ की तरह मेरा फ़िर देर से उठना, स्कूल के लिए जल्दी-जल्दी तैयार होना, माँ का रोज़ की तरह ऑटोवाले के आने पर चिल्लाना, मेरा उस ऑटो में रोज़ की तरह आगे वाली सीट पर बैठना और रोज़ की तरह स्कूल के लिए रवाना होना। ये सब इसी ओर इशारा कर रहे थें कि उस दिन भी न तो मेरी ज़िन्दगी बाकी दिनो से कुछ अलग थी और ना ही मैंने किसी अन्यथा की उम्मीद ही की थी। 

शायद उस दिन सब बदलने वाला था...

हमारी उस ऑटो में कुल आठ बच्चे थे जिनमे से दो लड़के और बाकी सब लड़कियाँ थीं। ऑटो में मेरी आगे की सीट हमेशा तय रहती थी, जिसपे बैठ कर मैं रोज़ की तरह उसके बारे में सोचा करता, उस नन्ही-सी लड़की के बारे में…

हमारी ऑटो, हर दिन, जब सौम्या नाम की लड़की को लेने पहुँचती तो उसके घर के बगल वाले घर में रहने वाली एक लड़की हमेशा ही खिड़की से झांक कर हमे देखा करती। हमें देख कर उसके चेहरे पर हमेशा ही एक अबोध व प्यारी-सी मुस्कान आ जाती। वो हमसे मिलने कभी बहार तो नहीं आयी पर शायद वो हमें अपना दोस्त मानती थी। उम्र उसकी तक़रीबन आठ -दस साल रही होगी पर वो कभी स्कूल नहीं गयी। जाती भी कैसे? ज़ुबान से मौन व मानसिक रूप से कमज़ोर जो थी वो। ये सब अपने ऑटो में एक बार पूछने पे पता चला था मुझे। 

मैंने उस बच्ची की आँखो को एक अजीब-सा दर्द छुपाते देखा था, महसूस किया था। उसकी मुस्कान मानो हमसे कुछ कहने को आतुर हो। लेकिन वो कभी कुछ नहीं बोलती, बस खिड़की पर अपना सर रख हमे आशा भरी नज़रो से देखती रहती। 

ऑटो के अन्य बच्चों को उस बच्ची में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। वो मेरी उस बच्ची में बढ़ी जिज्ञासा को शायद इसी कारण कभी समझ नहीं पाये, और शायद मैं भी इसी कारण अकेला, मन ही मन, उसके बारे में सोचा करता। कभी-कभी सौम्या मुझसे बात करते समय उसके बारे में बता देती थी; जैसे हाल ही में उसने बताया था कि उस लड़की के माँ-बाप बड़े ही अजीब और गुस्सैल किस्म के लोग थे। वे समाज से कटे-कटे रहते थे, और उस बच्ची को कभी-भी किसी से मिलने नहीं देते थे। इन सब के ऊपर, उनके घर से हमेशा लड़ने की आवाज़ें आती थीं। यह सब सोचकर मुझे अंदर ही अंदर बहुत कुढ़न होती थी, परन्तु बस मन मसोस के रह जाता था। 

उस दिन भी कुछ ऐसे ही विचार थे मेरे ज़ेहेन में जब हमारी ऑटो सौम्या के घर पहुंची। रोज़ की तरह हमारी दोस्त उस दिन भी खिड़की के पास बैठी थी। लेकिन आज उसका ध्यान हमारी तरफ नहीं था। उसके हाथ में एक कटोरी थी जिसमें शायद कुछ अनार के दाने थे। दूसरे हाथ से वो खिड़की के ठीक सामने से किसी को अपने पास बुला रही थी। उसकी आँखो में एक बहूत ही निर्मल-सी चमक थी, एक उत्साह था, एक आशा थी या शायद किसी चीज़ को पाने की चाह। उसने अपने निचले होठ को अपने नन्हें दाँतो के बीच दबा रखा था जिसके कारण कुछ लार उसके मुँह से टपक कर उसकी ठुड्डी तक आ गयी थी। पर उस पगली का ध्यान अपनी ठुड्डी पर कहाँ था! वो तो अपनी ही किसी दुनिया में खोई हुई थी। चेहरे पर कोमल कमल से भी मादक मुस्कान के साथ घर के सामने वाले पेड़ की ओर इशारे करने में ध्यान था हमारी नादान दोस्त का। 

थोड़ी ही देर में, उस पेड़ से दो नन्हे परिन्दे उड़कर खिड़की पर जा बैठे और कटोरी में रखा हुआ अनार खाने लगे। देखने से तो ऐसा लग रहा था मानो वो बच्ची उन परिंदो के और वो परिंदे उस नन्ही-सी बच्ची के बातो को बड़े ही सरलता से समझ रहे हो। बच्ची उन्हें अनार के दाने खाते हुए देखती रही और उनके परो को अपने कोमल हाथो से सहलाती रही। खेल-खेल में दोनो पंछी कभी उसके बालो को अपने चोच में दबा लेते तो कभी अनार की जगह उसकी ऊँगली पर चोच मारते, जिससे बच्ची खिलखिला उठती। 

बहुत ही प्यारा और मनमोहक दृश्य था वो, भावनात्मक सौन्दर्य की पराकाष्ठा का एक अनमोल उदहारण।

इन सब के बीच, अचानक ही, उसकी नज़र हमारी तरफ पड़ी। रोज़ की तरह वो हमें देखकर मुस्कुराई। इस बार मैं अपने आप को रोक न सका और हाथ हिला कर और उसकी मुस्कान का जवाब अपनी मुस्कान से देकर अपने मन को शांत किया। वो मुस्कुराहट और भी खिल उठी। उसकी ख़ुशी का अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब उसने मेरी तरफ देखकर पास आने का इशारा किया। ऑटो के बच्चे ये देखकर उत्साहित हो उठें क्योकि उस दिन तक उस बच्ची ने कभी किसी की ओर इशारा नहीं किया था।

मैं उठ कर उसके पास जाने लगा की तभी अंदर से किसी के चीखने की आवाज़ आई, "देखो ! फिर से बाहर किसी को अपनी बदसूरत शक्ल दिखा रही है|" जिसका उत्तर किसी महिला ने चिल्लाते हुए दिया, "तंग आ गई हूँ मैं इस डायन से ! जाने कहाँ से ये हमारे घर में आ गई !" । माँ-बाप के मुख से निकले इस ज़हर को पचा पाना मेरे जैसे अजनबी के लिए भी आसान न था। यह सुनकर तो मैं सहसा-सा कुछ पल के लिए वहीं खड़ा रह गया। उस प्यारे से चेहरे को देखते हुए मैं सोचने लगा की इस चेहरे को कोई बदसूरत कैसे कह सकता है? बोझ कैसे समझ सकता है? यह तो अभी अबोध बच्ची है। उस बेचारी ने तो माँ-बाप के इन कठोर वाक्यो को सुनकर भी अनसुना कर दिया, मानो उसे इसका मतलब ही न पता हो। 

अबोध, अनजान-सी वो उस समय भी मुझे पास बुलाती रही। मैं भी इन वाक्यों को अनसुना कर के आगे बढ़ने ही वाला था कि तभी उसके पिता की बेरहम आवाज़ मेरे कानो में दोबारा पड़ी। "आज सारा मामला ही ख़त्म कर देता हूँ।" वो चिल्लाये। इससे पहले की मैं एक और कदम आगे रखता, उसके पिता का हाथ उस फूल से चेहरे पर एक करारे तमाचे के साथ ज़ोर से पड़ा। वो थप्पड़ भी इतनी तेज़, कि बच्ची का सर खिड़की से जा टकराया। मैं आगे बढ़ता लेकिन उससे पहले ही उन बेरहम हाथों ने बच्ची को उसके बालों से अंदर की ओर खींच लिया और खिड़की ज़ोर से बंद कर दी। मेरा गला सूख गया; शोक व चिंता से भरा मेरा हृदय भय और क्रोध के सैलाब से हदस चुका था। मैंने उस बच्ची की आँखों में आँसू देखे थे, और मेरे लिए इतना ही काफ़ी था। मैं खिड़की को ज़ोर ज़ोर से थपथपा कर आवाज़ लगाने लगा लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया, जो आवाज़ें आयीं वो अंदर से सामान के इधर उधर गिरने की आयीं। मेरा आवाज़ लगाना चीखों में बदलने ही वाला था की मेरे ऑटो के ड्राइवर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे रोकते हुए बोले, "चलो प्रशांत ! ये उनके घर का मामला है, बेटा! हम इसमें चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते।" लेकिन वो गलत थें! शायद, अगर मैं आवाज़ लगाता तो सब रुक जाता; लेकिन मैंने भइया की बात ही मान लेना सही समझा। यह मेरे ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी।

फिर हम बच्चों के उतरे हुए चेहरों के साथ ऑटो में बैठे और स्कूल की तरफ चल दिए। पूरे रास्ते किसी ने किसी से बात नहीं की। स्कूल से घर आते समय तक सब सामान्य हो गया, जैसे की वो इस भयानक दृश्य को भूल गये हों! लेकिन मेरे मन में वो दृश्य घर कर चुका था और वो भी कुछ इस हद तक की मुझे अपने आप पर क्रोध आने लगा था। उस पूरे दिन मैंने किसी से बात नहीं की। अपने कमरे में परेशान-सा बिस्तर पे लेटा रहा। कभी चीखा तो कभी घोर चिंतन में डूब गया। मैं पूरी रात उस बच्ची का मासूम चेहरा याद करके रोता रहा। 

मुझे इस बात का एहसास हो चुका था कि वो हमें देख कर क्यो मुस्कुराती थी। उस बच्ची ने अपनी पूरी ज़िंदगी उस घर में बितायी थी और ना जाने वहाँ उसने कितनी यातनाएं सही होंगी! उसका साथ देने वाला उस घर में कोई भी नहीं था; ना ही कोई ख़ुशी देने वाला और ना ही कोई ग़म बाँटने वाला। वो हमेशा अकेली घुटन-सी भावनाओं के साथ जीती रही होगी। वो ज़िंदगी भी कुछ ऐसी कि किसी भी साधारण इंसान को कुढ़ने पर मजबूर कर दे। लेकिन नहीं, वो कभी कुढ़ी नहीं। उसके पास 'ना कुढ़ने' की एक वजह थी। 

हमारे ऑटो और उसमें उत्साहित बच्चो को वो अपने जीवन का एक हिस्सा समझने लगी थी, शायद। अपनी आँखों से हमें अपनी हर बात बताया करती थी! उसे लगता था कि हम उसे सुन रहे हैं, समझ रहे हैं! उस दिन भी वो मुझसे कुछ कहना चाहती थी; लेकिन मैंने उसे सुनने की ज्यादा कोशिश ही नहीं की, उससे मिलने की कोशिश नहीं की। 

मैंने कुछ भी नहीं किया। 
इन सारे ख्यालों ने मेरे ज़ेहेन पर एक गहरा निशान बना दिया था। 

अगले दिन में स्कूल नहीं गया। सुबह से ही उस बच्ची से मिलने का मन बना रखा था, तो अपनी साइकिल लेकर उसके घर की ओर निकल पड़ा। पहुँचने पर वहाँ के दृश्य को देखकर मेरे सीने में एक अजीब-सी कभी न रुकने वाली चुभन पैदा हुई। वो चुभन आज तक मेरे सीने में खंजरो के वार जैसा असर करती है।

वहाँ उस बच्ची के घर से थोड़ा आगे एक पुलिस की जीप खड़ी थी जिसमें एक औरत और साथ ही एक आदमी को हथकड़ी पहना कर रखा गया था। शायद ये वही आदमी था जिसने उस दिन बच्ची को थप्पड़ मारा था। इससे पहले कि मैं कुछ ज्यादा सोच पाता, मेरी नज़र एक एम्बुलेंस पर पड़ी जिसमे चादर में लपेेटी हुई एक लाश रखी हुई थी। वो लाश उस नन्ही-सी जान की थी... 

ये देखने के बाद मेरे शरीर में कुछ बोलने ,सुनने ,देखने या करने की ताकत नहीं बची थी। मेरे शरीर शून्य की स्थिति को महसूस कर रही था। मैं वहाँ,सहसा अपने घुटनों पर गिरकर रोने लगा। मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था सिवाय उस ख्याल के....

"मैंने कुछ भी नहीं किया।"

लेकिन अब इन सब का कोई फ़ायदा नहीं था, क्योँकि वो कोमल-सी मुस्कान अब उस चादर के नीचे छुप गई थी; वो फूल-सा चेहरा अपनी मुस्कान खो चुका था। उस नन्ही-सी जान को जूतो से रौन्दा गया था; उसके वर्षों से शांत ग्रीवा को बेरहमी से रेत दिया गया था। मैंने आवाज़ नहीं उठाई शायद इसीलिए …उस गुलाब-सी प्यारी मासूम की हत्या कर दी गई थी।

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